Sunday, August 20, 2017

तमाशा।

तमाशा हो रहा है
और हम ताली बजा रहे हैं

मदारी
पैसे से पैसा बना रहा है
हम ताली बजा रहे हैं

मदारी साँप को
दूध पिला रहा हैं
हम ताली बजा रहे हैं

मदारी हमारा लिंग बदल रहा है
हम ताली बजा रहे हैं

अपने जमूरे का गला काट कर
मदारी कह रहा है-
'ताली बजाओ जोर से'
और हम ताली बजा रहे हैं।

बोधिसत्व, मुंबई

जीवन कभी नहीं रुकता है ।

भले रोक दे राज्य तुम्हारा रथ फिर भी,
भले रोक दे भाग्य तुम्हारा पथ फिर भी,
जीवन  कभी नहीं  रुकता है, चाहे वक्त ठहर जाए।

जीवन तो  पानी  जैसा  है, राह  मिली  बह जाएगा,
चाहे जितना कठिन सफ़र हो, राह  बनाता जाएगा,
कोई सुकरात नहीं मरता है, चाहे  ज़हर उतर जाए।

काट  फेंक  दे  मिट्टी में, जीवन फिर से उग आएगा,
चाहे जितनी मिले पराजय, फिर भी स्वप्न सजायेगा,
बढ़ा  क़दम  बढ़ता  जाएगा, चाहे  जो  मंज़र आए।

सब कुछ हो प्रतिकूल किन्तु वक्त  गुजर ही जाता है,
रात  अंधेरी  होती  जितनी,  सुखद  सवेरा  आता है,
जा  पहुँचेगा  तैराक  किनारे, चाहे बड़ी लहर आए।

जलती बाती बिना तेल की, धुआँ धुआँ सा उठता है,
चुपके से आकर अँधियारा, स्वत्व  दीप का लुटता है,
अपने हाँथो कवच बना लो, लौ की तेज उभर आए।

कहीं  चुरा  ले  नियति  न  सपने, तुमने सदा सँजोए,
कहीं  बुझा  दे  प्रीति  न  कोई,  तुमने  सदा  अँजोए,
इसके पहले नाव खोल दो, कहीं न  रात उतर आए।

                            (.......रविनंदन सिंह)

Monday, June 5, 2017

इलाहाबाद संग्रहालय की वर्तमान दशा पर माननीय मुख्यमंत्री जी से निवेदन ।

हम बस आपसे निवेदन करते हैं,
कि प्रत्येक शहर में एक लाइब्रेरी होती है
और हमारे शहर इलाहाबाद में भी एक लाइब्रेरी है
जो अब कबूतरों और धूल का अड्डा बन चुकी है
कभी गुलजार रहने वाले उनके बगीचे अब घास और झाड़ियों से अटे पड़े हैं
और साइकिल स्टैण्ड जुआरियों और नशेडियों की पनाहगाह।

ऐसा लगता है मानो पिछले कई दशकों से किसी भी सरकार ने उनकी सुध लेने की नहीं सोची
कही पर मालवीय जी के नाम पर बना पुस्तकालय जर्जर खड़ा है
तो कहीं पर टैगोर, गाँधी और विवेकानन्द जी के नाम पर बना पुस्तकालय
तालों के पीछे अपने समृद्ध इतिहास को ओढ़े उदास सा खड़ा है
हर शहर में ऐसी लाइब्रेरी होती थी जो अब वीरान पड़ी है
या फिर विकास के रास्ते से भटक चुकी है
अब वक्त आ गया है कि
मुख्यमंत्री जी आप स्वये उन स्थानों का गौरव फिर से लौटाने का प्रयत्न करें
ताकि नई पीढ़ी को भी शहर के कौतुहल में दिमागी कसरत के लिए माहौल मिल सके ।


(क्योंकि पढ़ेगा इण्डिया तभी तो बढ़ेगा इण्डिया)

Tuesday, January 10, 2017

मेरा रायपुर शहर अब बदल चला है !

कुछ अजीब सा माहौल हो चला है,
मेरा रायपुर अब बदल चला है….

ढूंढता हूँ उन परिंदों को,
जो बैठते थे कभी घरों के छज्ज़ो पर
शोर शराबे से आशियाना
अब उनका उजड़ चला है,
मेरा रायपुर अब बदल चला है…..

होती थी ईदगाह भाटा से
कभी तांगे की सवारी,
मंज़िल तो वही है
मुसाफिर अब आई सिटी बस में
चढ़ चला है
मेरा रायपुर अब बदल चला है…

भुट्टे, चूरन, ककड़ी, इमली
खाते थे कभी हम
स्कूल कॉलेजो के प्रांगण में,
अब तो बस मैकडोनाल्ड,
पिज़्जाहट और
कैफ़े कॉफ़ी डे का दौर चला है
मेरा रायपुर अब बदल चला है….

वो राज, आनंद, बाबूलाल के दीवाने थे आप हम,
अब आइनॉक्स, बिग सिनेमा,
और पीवीआर का शोर चला है
मेरा रायपुर अब बदल चला हैै….

रायपुर के धडी चौक
, केटी चौराहे पर रुक कर बतियाते
थे दोस्त घंटों तक
अब तो बस शादी, पार्टी या
उठावने पर मिलने का ही दौर चला है
मेरा रायपुर अब बदल चला है….

वो टेलीफोन के पीसीओ से फोन
उठाकर खैर-ख़बर पूछते थे,
अब तो स्मार्टफोन से फेसबुक, व्हाटसऐप और ट्वीटर का रोग चला है
मेरा रायपुर अब बदल चला है…..

मोती बाग; गाँधी उधान और
अनुपम गाडेनृ में फलली, भेल, मुंगोडी का ज़ायका रंग जमाता था
अब तो सेन्डविच, पिज़्ज़ा, बर्गर और पॉपकॉर्न की और चला है
मेरा रायपुर अब बदल चला है….

वो साइकिल पर बैठकर
दूर टाटीबंद की डबल सवारी,
कभी होती उसकी,
कभी हमारी बारी,
अब तो बस फर्राटेदार
बाइक का फैशन चला है
मेरा रायपुर अब बदल चला है….

जाते थे कभी ट्यूशन
पढ़ने साहू सर के वहाँ,
बैठ जाते थे फटी दरी पर भी
पाँव पसार कर ,
अब तो बस ए.सी.कोचिंग क्लासेस
का धंधा चल पड़ा है,
मेरा रायपुर अब बदल चला है…..

खो-खो, लोहा-लंगड,
क्रिकेट, गुल्लिडंडा, पिटटूल
खेलते थे गलियों और
मोहल्लों में कभी,
अब तो न वो पुरानी बस्ती की गलियाँ रही
न बूढातालाब न वो सपऱे का खेल का मैदान,
सिर्फ और सिर्फ कम्प्यूटर गेम्स
का दौर चला है,
मेरा रायपुर अब बदल चला हैं…..

रंग मंदिर में अल-सुबह तक चलते क्लासिकल गाने-बजाने के सिलसिले
अब तो क्लब; पब, और डीजे का
वायरल चल पड़ा है,
मेरा रायपुर अब बदल चला है….

दानी, सालेम, डागा, डिगीृ कॉलेज की लड़कियों से
बात करना तो दूर
नज़रें मिलाना भी मुश्किल था
अब तो बेझिझक हाय ड्यूड,
हाय बेब्स का रिवाज़ चल पड़ा है
मेरा रायपुर अब बदल चला है….

घर में तीन भाइयों में
होती थी एकाध साइकिल
बाबूजी के पास स्कूटर,
अब तो हर घर में कारों
और बाइक्स का काफ़िला चल पड़ा है
मेरा रायपुर अब बदल चला है….

खाते थे राठौर चौक के समोसे,
सदर की कचोरी, साहू की जलेबी, शारदा चौक का फालूदा, गरमा-गरम बालूशाही रामजी में,
अब वहाँ भी चाउमिन, नुडल्स,
मन्चूरियन का स्वाद चला हैं
मेरा रायपुर अब बदल चला है….

कोई बात नहीं;
सब बदले लेकिन मेरे रायपुर के
खुश्बू में रिश्तों की गर्मजोशी
बरकरार रहे
आओ सहेज लें यादों को
वक़्त रेत की तरह सरक रहा है…
मेरा रायपुर अब बदल चला हैैं…


- श्रीराम द्विवेदी
मोबाइल : +91 966978062, +91 9644336644

Sunday, September 11, 2016

इतना मुश्किल भी नहीं है जीना !

महाश्वेता देवी जी की एक बहुत अच्छी कविता
***

आ गए तुम ?
द्वार खुला है अंदर आ जाओ

पर ज़रा ठहरो
दहलीज़ पर पड़े
पॉयदान पर
अपना अहम् झाड़ आना

मधु मालती लिपटी है
मुंडेर से
अपनी नाराज़गी
उस पर उंडेल आना

तुलसी के क्यारे में
मन की चटकन चढ़ा आना

अपनी व्यस्तताएँ
बाहर खूँटी पर टाँग आना

जूतों के साथ अपनी
हर नकारात्मकता
उतार आना

बाहर किलोलते बच्चों से
थोड़ी शरारत माँग लाना

गुलाब के साथ
उगी हैं मुस्कानें
तोड़ कर पहन आना

देखो
शाम बिछाई है मैंने
सूरज क्षितिज पर
बाँधा है
लाली छिड़की है नभ पर

प्रेम और विश्वास की
मद्धम आँच पर
चाय चढ़ाई है

घूँट-घूँट पीना
सुनो
इतना मुश्किल भी
नहीं है जीना ।

न मैं हँसी, न मैं रोयी !

न मैं हँसी, न मैं रोई
बीच चौराहे जा खड़ी होई

न मैं रूठी, न मैं मानी
अपनी चुप से बांधी फाँसी

ये धागा कैसा मैंने काता
न इसने बांधा न इसने उड़ाया

ये सुई कैसी मैंने चुभोई
न इसने सिली न उधेड़ी

ये करवट कैसी मैंने ली
साँस रुकी अब रुकी

ये मैंने कैसी सीवन छेड़ी
आँतें खुल-खुल बाहर आईं

जब न लिखा गया न बूझा
टंगड़ी दे खुद को क्यों दबोचा

ये दुख कैसा मैने पाला
इसमें अंधेरा न उजाला


- गगन गिल

पीठ !


यह एक पीठ है
काली चट्टान की तरह
चौड़ी और मजबूत

इस पर दागी गयीं
अनगिनत सलाखें
इस पर बरसाये गये
हज़ार-हज़ार कोड़े
इस पर ढोया गया
इतिहास का
सबसे ज़्यादा बोझ

यह एक झुकी हुई डाल है
पेड़ की तरह
उठ खड़ी होने को आतुर


- एकांत श्रीवास्तव
सौजन्य : जय प्रकाश मानस

फ़ोटू बचे रहेंगे !

बाढ़ के बीच
उस आदमी की हिम्मत
टँगी है आकाश में
और धरती डूबती जा रही है
पाँव के नीचे
बचाने के लिए
अब उसके पास कुछ नहीं है
सिवाय अपने
वह बचा हुआ है
बचाने को बाढ़
बाढ़ बची रहेगी
तो बाढ़ से घिरे आदमी के
फ़ोटू बचे रहेंगे


- डॉ. श्याम सुंदर दुबे

सौजन्य : जय प्रकाश मानस

और आज जेबें खट्- ख़ाली !

रात चूसती, दिन दुत्कारे
दुख-दर्दों के वारे-न्यारे।

परसों मिली पगार हमें है
और आज जेबें खट्-खाली
चौके की हर चुकती कुप्पी
लगती भारी भरी दुनाली
किल्लत किच-किच में डूबे हैं
अपने दुपहर, साँझ, सकारे।

पिछला ही कितना बाक़ी है
और नहीं देगा पंसारी
सूदखोर से मिलने पर भी
सुनना वही राग-दरबारी
भीतर के कच्चे मकान की
टूट बिखर जाती दीवारें।

मुझको क्या, हम सब को ही ज्वर
चढ़ता बारम्बार मियादी
आँखों में सपने बरसाकर
ओझल हो जाती है खादी
सालों तक की भूख- प्यास के
खा- पी लेते हैं हम नारे।


- शशिकांत गीते


सौजन्य : जय प्रकाश मानस

Saturday, May 7, 2016

बेटी से माँ का सफ़र !

(सभी महिलाओ को समर्पित)

बेटी से माँ का सफ़र 
बेफिक्री से फिकर का सफ़र
रोने से चुप कराने का सफ़र
उत्सुकत्ता से संयम का सफ़र

पहले जो आँचल में छुप जाया करती थी  ।
आज किसी को आँचल में छुपा लेती हैं ।

पहले जो ऊँगली पे गरम लगने से घर को उठाया करती थी ।
आज हाथ जल जाने पर भी खाना बनाया करती हैं ।

छोटी छोटी बातों पे रो जाया करती थी
बड़ी बड़ी बातों को मन में  रखा करती हैं ।

पहले दोस्तों से लड़ लिया करती थी ।
आज उनसे बात करने को तरस जाती हैं ।

माँ कह कर पूरे घर में उछला करती थी ।
माँ सुन के धीरे से मुस्कुराया करती हैं ।

10 बजे उठने पर भी जल्दी उठ जाना होता था ।
आज 7 बजे उठने पर भी 
लेट हो जाता हैं ।

खुद के शौक पूरे करते करते ही साल गुजर जाता था ।
आज खुद के लिए एक कपडा लेने में आलस आ जाता हैं ।

पूरे दिन फ्री होके भी बिजी बताया करते थे ।
अब पूरे दिन काम करके भी फ्री 
कहलाया करते हैं ।

साल की एक एग्जाम के लिए पूरे साल पढ़ा करते थे।
अब हर दिन बिना तैयारी के एग्जाम दिया करते हैं ।

ना जाने कब किसी की बेटी 
किसी की माँ बन गई ।
कब बेटी से माँ के सफ़र में तब्दील हो गई .....

Monday, March 7, 2016

मछलियाँ !

नये साल में फिर से याद आयी कविता
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एक बार हमारी मछलियों का पानी मैला हो गया था
उस रात घर में साफ़ पानी नहीं था
और सुबह तक सारी मछलियाँ मर गई थीं
हम यह बात भूल चुके थे

एक दिन राखी अपनी कॉपी और पेंसिल देकर
मुझसे बोली
पापा, इस पर मछली बना दो
मैंने उसे छेड़ने के लिए काग़ज़ पर लिख दिया- मछली
कुछ देर राखी उसे गौर से देखती रही
फिर परेशान होकर बोली- यह कैसी मछली !
पापा, इसकी पूँछ कहाँ और सिर कहाँ
मैंने उसे समझाया
यह मछली का म
यह छ, यह उसकी ली
इस तरह लिखा जाता है- म...छ...ली
उसने गम्भीर होकर कहा- अच्छा ! तो जहाँ लिखा है मछली
वहाँ पानी भी लिख दो

तभी उसकी माँ ने पुकारा तो वह दौड़कर जाने लगी
लेकिन अचानक मुड़ी और दूर से चिल्लाकर बोली-
साफ़ पानी लिखना, पापा !


प्रस्तुति - नरेश सक्सेना

साभार - जयप्रकाश मानस

नए जूते की महक और मेरा क़द !

पता नहीं क्यों
अक्सर जी करता है
याद करूँ
बचपन के उस क्षण को
काका ने लिवाया था मुझे
एक नया जूता का जोड़ा ।

नए जूते की महक को
पहली बार जाना था
काला जूता, चमकीला
पूरे मन को भा गया था
काका की हामी ने मेरा दिल भर दिया था

जैसे मेरे लिए ही बना था यह जूता
क्यूँ न याद करूँ उस क्षण को
पहली बार तो हो रहा था मैं
ज़मीन से थोड़ा ऊपर
जब मैं पहन कर जूता
पहली बार खड़ा हुआ था
ज़मीन पर

सब के सब क्षण भर में
थोड़े छोटे लगने लगे थे
झेंप गया था काका को देखकर मैं
भाँप लिया था काका ने इसे
कैसा है?
थोड़ा चलकर भी देखो
कहा था तत्काल ।


प्रस्तुति- संजीव बख्शी

साभार- जयप्रकाश मानस


जो पिता होते हैं ।

चाहे हाड़ तोड़कर - चाहे हाथ जोड़कर
सबसे अंतिम में पाँव पकड़कर
इन सबसे पहले गुल्लक फोड़कर
ले ही आते हैं अनाज पीठ लादकर
सबसे मनहूस - अंधेरी गलियों में
दिन ढ़लने से पहले
जो पिता होते हैं

जो पिता होते हैं
वे कभी नहीं थकते
पालनहार देवता, उनके पिता ईश्वर
थक हार भले मुँह छुपा लें
वे कभी नहीं छुपते
चलते रहते हैं हरदम - गलते रहते हैं हरपल
भूल से भी कभी नहीं थमते ।

सबके सब भीतर थे तब !

हमारे भीतर होता था खिलखिलाता मन
मन के बहुत भीतर सबसे बतियाता घर

घर के भीतर उजियर-उजियर गाँव
गाँव के भीतर मदमाते खेत

खेत के भीतर बीज को समझाती माटी
माटी के भीतर सुस्ताते मज़ूर और सिर-पाँव

पाँव के भीतर सरसों, गेहूँ, धान की बालियाँ
बालियों के भीतर रंभाती गाय

गाय के भीतर हंकड़ते बछड़े
बछड़े के भीतर कम-से-कम एक जोड़ी बैल

बैल के भीतर हरी-भरी घास
घास के भीतर मोती-सी चमकती ओस

ओस के भीतर जीवन का पानी
पानी के भीतर घड़ा, कौआ, कंकड़ की कहानी

कहानी के भीतर हम सबका मन
मन के भीतर अब्बा, अम्मा, दादी, पड़ोस

पड़ोस के भीतर लकरी, नमक, आग, संतोष
इन सबके बहुत भीतर जीवन का जोश

सबके सब भीतर थे जब
सबका बाहर भीतर था तब

अब सब बाहर-ही-बाहर
कहाँ से भरे गागर में सागर ?


प्रस्तुति - जयप्रकाश मानस

दरअसल ।

जल बचा था
दिखना बचा हुआ था
कहीं-न-कहीं
कम-से-कम कोई तालाब

तालाब बचा था
दिखना बचा हुआ था
कभी-न-कभी
कम-से-कम कोई घाट

घाट बचा था
दिखना बचा हुआ था
कुछ-न-कुछ
कम-से-कम कोई चित्र

चित्र बचा था
दिखना बचना हुआ था
कैसे-न-कैसे
कम-से-कम कोई मित्र

एक दिन जब मित्र न बचा था
न दिखना बचा हुआ था
चित्र
घाट
तालाब
जल
न आज न कल

दरअसल ।

प्रस्तुति - जयप्रकाश मानस